पोस्टर में मुस्कान, अंदर टेंशन! जौनपुर सदर में सपा के मुस्लिम नेताओं की ‘कुर्सी’ पर संकट

पोस्टर में मुस्कान, अंदर टेंशन! जौनपुर सदर में सपा के मुस्लिम नेताओं की ‘कुर्सी’ पर संकट

जौनपुर सदर में सपा-कांग्रेस समीकरण ने बदली सियासत, नदीम जावेद की सक्रियता से बढ़ी हलचल

आरिफ़ हुसैनी

जौनपुर । मिशन 2027 को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे गरमाने लगी है और इसी कड़ी में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और प्रियंका गांधी की कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन की चर्चा तेज हो गई है । हालांकि अभी तक प्रदेश में सीटों का औपचारिक बंटवारा नहीं हुआ है, लेकिन अंदरखाने दोनों दल अपने-अपने स्तर पर जिताऊ उम्मीदवारों का सर्वे करवा रहे हैं ।
इसी बीच जौनपुर सदर विधानसभा सीट पर राजनीतिक गतिविधियां अचानक तेज हो गई हैं । कांग्रेस के पूर्व विधायक नदीम जावेद ने क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है । उनकी टीम ने 2027 चुनाव को ध्यान में रखते हुए जमीनी स्तर पर काम शुरू कर दिया है । शहर में लगाए गए पोस्टरों के जरिए ईद और नवरात्र की बधाई दी जा रही है, जिससे चुनावी माहौल की आहट साफ महसूस की जा सकती है ।
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इन पोस्टरों में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव और सांसद डिंपल यादव की तस्वीर भी लगाई गई है । इससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि जौनपुर सदर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर नदीम जावेद को संभावित तौर पर “हरी झंडी” मिल चुकी है या कम से कम गठबंधन की दिशा में सकारात्मक संकेत हैं ।

अंदरखाने क्या है रणनीति?

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक हाल ही में प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव के बीच हुई बैठक में उत्तर प्रदेश की करीब 27 सीटों पर कांग्रेस को तैयारी करने के संकेत दिए गए हैं । इनमें जौनपुर सदर सीट भी शामिल बताई जा रही है। यही वजह है कि नदीम जावेद ने अपनी चुनावी तैयारियां समय से पहले तेज कर दी हैं ।

सपा के मुस्लिम नेताओं में बढ़ी बेचैनी

इस बदलते राजनीतिक समीकरण का सबसे ज्यादा असर सपा के उन स्थानीय मुस्लिम नेताओं पर पड़ता दिख रहा है, जो लंबे समय से जौनपुर सदर सीट पर अपनी दावेदारी मजबूत मानते रहे हैं । अब सवाल उठ रहा है कि अगर यह सीट गठबंधन में कांग्रेस के खाते में जाती है, तो इन नेताओं की भूमिका क्या रह जाएगी ।
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कई ऐसे नेता, जो अब तक केवल टिकट की दौड़ में सक्रिय रहते थे, उनका जमीनी जनसंपर्क और संगठनात्मक काम सीमित रहा है । चायखानों और छोटी बैठकों तक सीमित राजनीति, गुटबाजी और सपा चीफ़ का  “करीबी होने” के दावों ने उनकी छवि को भी प्रभावित किया है ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सपा-कांग्रेस गठबंधन औपचारिक रूप लेता है और जौनपुर सदर सीट कांग्रेस के खाते में जाती है, तो सपा के स्थानीय मुस्लिम नेताओं को या तो संगठन में नई भूमिका दी जाएगी या उन्हें दूसरे क्षेत्रों में समायोजित किया जा सकता है ।
फिलहाल जौनपुर की राजनीति में एक बात साफ है 2027 का चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन उसकी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है, और जौनपुर सदर सीट इस बार भी हाई-प्रोफाइल मुकाबले का केंद्र बन सकती है ।

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