इस बार पक्का सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष जौनपुर से......
जौनपुर । समाजवादी पार्टी में जौनपुर की सियासत इन दिनों दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ जिले से राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय मुस्लिम नेताओं की लंबी कतार है, दूसरी तरफ सबसे बड़ी कुर्सी राष्ट्रीय अध्यक्ष अब भी दूर नजर आती है। ऐसे में अब “हमारा भी नंबर आए” की मांग ज़ोर पकड़ने लगी है।
जौनपुर से जुड़े कई मुस्लिम चेहरे पार्टी में बड़े पदों पर हैं । कोई राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, कोई राष्ट्रीय प्रवक्ता, कोई राष्ट्रीय मीडिया पैनलिस्ट तो कोई राष्ट्रीय सचिव । कागज़ पर सब कुछ मजबूत दिखता है, लेकिन सवाल वहीं का वहीं है जब इतने मुस्लिम चेहरे हैं, तो आखिर चेहरा “सबसे बड़ा” क्यों नहीं बन पा रहा?
राजनीतिक गलियारों में धीरे-धीरे यह चर्चा भी तंज में बदलती जा रही है कि जौनपुर के नेता मंच और माइक्रोफोन तक तो ठीक हैं, लेकिन निर्णय लेने वाली टेबल तक उनकी पहुंच अब भी सीमित क्यों है। क्या यह सिर्फ संयोग है या फिर संगठन के भीतर उनकी असली पकड़ उतनी मजबूत नहीं, जितनी दिखाई जाती है?
स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच भी अब फुसफुसाहट तेज है । हर बार भीड़ हमारी, नारे हमारे… लेकिन कुर्सी किसी और की। यह सवाल अब सीधे तौर पर नेतृत्व की ओर नहीं, बल्कि जौनपुर के नेताओं की राजनीतिक क्षमता और प्रभाव पर भी उठने लगा है।
विश्लेषकों की मानें तो राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी कुर्सी सिर्फ क्षेत्रीय दबाव या संख्या के दम पर नहीं मिलती। इसके लिए पार्टी के भीतर ऐसा प्रभाव चाहिए, जो फैसलों को मोड़ सके और शायद यही वह जगह है, जहां जौनपुर अब तक पीछे रह जाता है।
जौनपुर से उठी यह मांग जितनी तेज है, उतनी ही सवालों के घेरे में भी है। क्योंकि सियासत में सिर्फ मांग से नहीं, ताकत से कुर्सी मिलती है और अब देखना यही है कि जौनपुर के नेता इस फर्क को कब और कैसे साबित करते हैं।

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