“इमाम रज़ा की विलादत पर सजी रूहानी महफ़िल, उलेमाओं के ख़िताब और शायरों के कलाम ने बांधा समां”

“इमाम रज़ा की विलादत पर सजी रूहानी महफ़िल, उलेमाओं के ख़िताब और शायरों के कलाम ने बांधा समां”

जौनपुर। हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की विलादत के मुबारक मौके पर बंधन लॉन कठघरा में जश्ने इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का आयोजन बड़े ही अकीदत और एहतराम के साथ किया गया ।  कार्यक्रम का आयोजन मिर्ज़ा जावेद सुल्तान की ओर से किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की।
महफ़िल की शुरुआत मौलाना सफ़दर हुसैन ज़ैदी के ख़िताब से हुई। उन्होंने अपने कहा कि हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम की ज़िंदगी इल्म, सब्र और इंसानियत की बेहतरीन मिसाल है । उन्होंने लोगों से अपील की कि इमाम की सीरत को अपने जीवन में उतारकर समाज में मोहब्बत, अमन और भाईचारे को बढ़ावा दें ।
इसके बाद मौलाना फज़ले मुमताज़ खान ने अपने बयान में कहा कि हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने हमेशा इंसाफ, करुणा और सच्चाई का पैग़ाम दिया । उन्होंने कहा कि आज के दौर में उनकी शिक्षाएं और भी ज़्यादा अहम हो जाती हैं, जब समाज को एकता और सद्भाव की ज़रूरत है ।
उलेमाओं के ख़िताब के बाद मशहूर शायरों ने इमाम रज़ा की शान में अपने कलाम पेश किए , डॉ. नायाब बलयावी, तनवीर जौनपुरी, अनीस जायसी, सुहैल बस्तवी और वारिस जलालपुरी ने अपनी शायरी से महफ़िल को रूहानी रंग में रंग दिया । खासतौर पर डॉ. नायाब बलयावी का यह शेर
"लकीर खानए काबा की मिट नहीं पाई,
सुना है हमको ज़माना मिटाने वाला है"
को अकीदतमंदों ने खूब सराहा और दाद दी ।
कार्यक्रम के अंत में दुआ के साथ महफ़िल का समापन हुआ। पूरे आयोजन में अकीदत, मोहब्बत और भाईचारे का शानदार माहौल देखने को मिला ।

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